भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान की शैक्षिक पत्रिका

लेन्साइट की फरवरी,2015 से नये रूप में और चल प्रतिमाओं की कला को नयी दृष्टि से देखने के साथ पुनः वापसी हुई है। इसमें हम जिस पद्धति से चल प्रतिमाओं के साथ सम्बन्ध जोडते हैं , इस पर उन्हें डिजिटल मीडिया किस तरह प्रभावित कर रहा है , इस पर चर्चाओं समकालीन सिनेमा, पर आलेखों, उसके इतिहास और सौंदर्यशास्त्र पर चर्चाओं को सम्मिलित किया गया है ।
 
लेन्साइट हर तिमाही में प्रकाशित किया जाता है।

संपादक
डी.जे. नारायण

संपादकीय समन्वयन
इंद्रनील भट्टाचार्य

कार्यकारी संपादक

एक प्रति के लिए रू.200/-,वार्षिक अंशदान - रू.600/-( अंशदान प्रपत्र डाउनलोड करें ) ( लिंक की जानकारी दी जायेगी )

वर्तमान- जनवरी से मार्च,2015 - संस्करण में समावेश

1. सजीव और अनन्य- अभिजित रॉय
2. द लंच बॉक्स (हिन्दी)- मिहिर पंड्या
3. कथा-इतिहास की संकल्पनात्मक पध्दति- अनिल झणकर

 

4. मेमरी एज परफॉरमन्सः रिचर्ड लिंकलेटर्स के बचपन का मामला-
   इंद्रनील भट्टाचार्य

5. डिझायरेबल बट डेंजरस,फेम फेटाल इन हिन्दी नॉयर फिल्म- चंद्रशेखर
   जोशी
6. फ्रॉम स्लीपलेस नाइट टू द सीजन ऑफ स्लीपः क्लेअन्स क्लिनिकल
   ऑटोपसी ऑफ द सेक्यूलर सेल्फ - देब कमल गांगुली
7. स्कोरिंग द स्क्रीन- आयेशा इकबाल विश्वमोहन
8. रिबेका- उपन्यास और फिल्म- गायत्री चॅटर्जी
9. ट्रॅजेक्टरी ऑफ इंन्ड्युरन्स- स्टिव मॅक्विन का सिनेमाः दीपंकर सरकार
10. अभिनय प्रक्रिया के रहस्य को हटाना- ऊर्वझी इरानी
11. डुबकी लेना (फिल्म किला की समीक्षा) - फतेमा कागलवाला
12. फीचर फिल्म ल मिझरेबल के लिए सर्वोत्तम निर्माण ध्वनि मिश्रण         
    के लिए सन् 2013 को ऑस्कर पुरस्कार विजेता सिमॉन हेस के  
    साथ वार्तालाप
13. डॉ.फिल्ममेकर - स्ड्रॅडलिंग द वर्डस ऑकॅडमिया एंड प्रॅक्टिस- अनुराधा
     कपूर
14. टगौर,सिनेमा और मुवमेंट की कविता- इंद्रनील भट्टाचार्य
15. द हम्प्टी - डम्प्टीनेस ऑफ " एक्सपेरिमेंट" एज अप्लाइड टु
    म्युझिक -एक्रिटिक इन म्युझिक फ्रॉम  सबकॉंटीनेंटल ऑब्जर्वर-  
    डॉ.केदारनाथ आवटी
  
  ‘ लेन्साइट ’ अनुसंधानकर्ता, अध्यापक और फिल्म समीक्षकारों से शैक्षिक तथा समीक्षात्मक रूप से योगदान स्वीकार करना है। योगदानकर्ताओं से अनुरोध है कि वे ( अधिकतम 200 शब्दों तक ) अपने सार-संक्षेप भेजें।

यहांपर लेन्साइट वार्षिक अंशदान के लिए क्लिक कर डाउनलो़ड करें ।                                
  
पेपर के लिए आंमत्रण - लेन्साइट - विशेषांक जारीः फिल्म इतिहास और इतिहास लेखन पुऩः भेंट (ग्रीष्म - 2015 )

फिल्म इतिहास के अध्ययन ने प्रौद्योगिकी, अभिलेखीय प्रथाओं और समकालीन सिद्धांत से अनुशासन प्रिय नये संबंधों के कारण 21 वीं सदी में नया मोड ले लिया है । हाल ही में, फिल्म इतिहास के अध्ययन में कई दृष्टिकोण एवं परिष्कृत कार्यप्रणाली सामने उभर कर आयी है । भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान की शैक्षिक पत्रिका लेनसाइट की आगामी अंक हेतु फिल्म इतिहास के समकालीन दृष्टिकोण पर विचार अथवा परिप्रश्न करने वाले निबंध एवं लेख आमंत्रित किये जाते है। हम ऐसे योगदान का स्वागत करते है, जो फिल्म इतिहास के बीसवीं सदीं के दृष्टिकोण (विचार) की जांच, आलोचना अथवा निर्विवाद विकल्प प्रस्तुत करते हो । इसमें फिल्म इतिहास के औपचारिक, तकनीकी-औद्योगिक संभाषण जिसमें ध्वनि (मूक सिनेमा/ टाकीज), स्टूडिया सिनेमा, रचनाकारिता, शैली और राष्ट्रीय सिनेमा आंदोलन शामिल है । हमें विशेष रुप से ऐसे योगदान में अभिरुचि है, जो फिल्म इतिहास को संभाषण एवं जटिल प्रथा दोनों रुप में पुऩः धारणा प्रदान करते है ।

विषयों को विचारार्थ शामिल किया जा सकता हैं किन्तु उन्हें निम्नलिखित तक ही सीमित नहीं किया जाता है :-
. 21 वीं सदी में फिल्म इतिहास लेखन
. फिल्म इतिहास के स्त्रोत - पुराने और नये
. इतिहास और अभिलेखीय प्रथाओं से उसका संबंध
. फिल्म इतिहास अध्यापन
. राष्ट्रीय सिनेमा गतिविधियों का इतिहासलेखन
. 21 वीं सदी की दिशा में सिनेमा का इतिहास
. फिल्म ध्वनि का इतिहास  

    जानकारी / सार को lensighteditorial@gmail.com पर भेंजे जाने चाहिए, सम्पूर्ण लेख प्राप्ति की अंतिम-तिथि है - 31 मई,2015.